उत्तरी भारत में कुसुम की खेती Safflower Cultivation in Northern India

अंजलि साहनी, आर सी चौधरी एवं शिव बदन मिश्रा
पीआरडीएफ, 59 नहर रोड़, शिवपुर सहबाजगंज, गोरखपुर । Email- ram.chaudhary@gmail.com
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परिचय- कुसुम/करड़ी सबसे पुरानी वार्षिक तिलहन फसल है जो सूखा क्षेत्रों द्वारा अच्छी तरह से अपनाया गया इसको अंग्रेजी भाषा में सेफलावर और वैज्ञानिक भाषा में कास्थैमस टोंक्टोरियस कहते है । कुसुम रबी मौसम में उगाये जाने वाली बहुउपयोगी तिलहन फसल है । इसके दानों मे २९ से ३३ प्रतिशत तेल, १५ प्रतिशत प्रोटीन, १५ प्रतिशत शक्कर, ३३ प्रतिशत रेशा एवं ६ प्रतिशत राख पायी जाती है । इसके औसत उपज २५०० (2500) किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है । कुसुम की जड़े गहराई तक जाकर पानी सोख लेने की क्षमता रखती है, जिससे इनको बारानी खेती के लिये विशेष उपयुक्त माना जाता है ।
सिंचित क्षेत्र में कुसुम का पौधा कम सिचाई में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है । भारत में मूल रूप से सितम्बर माह में भूमि में प्राप्त नमी होने से अन्य रबी फसल जैसे- गेहूँ, चना इत्यादि की बुआई अधिक तापमान के कारण नही कर सकते, लेकिन कुसुम की फसल तापमान के लिये असंवेदनशील होने के कारण इन परिस्थितियों में उगाकर भूमि में स्थित नमी का पूरा लाभ ले सकती है । कुसुम की अधिक पैदावार के लिये २२ से लेकर २५ डिग्री सेल्सियस आवश्यक तापमान है, तथा जमाव के लिये १५ डिग्री सेल्सियस है ।
शून्य कोलेस्ट्राल तेल की फसल होने के कारण इसका उपयोग लाभदायक होता है । इसके फूलों में भी अनेक औषधीय गुण पाये जाते है जिसके कारण अनेक आयुवेंदिक औषधियों में इसका उपयोग होता है । इसके उपयोग का पूरा विवरण तालिका १ में दिया गया है । इसका तेल खाने के लिये अच्छा स्वादिष्ट होकर इसमें स्थित विपुल असंतृप्त वसीय अमलों के कारण हृदय रोगियों के लिये विशेष उपयुक्त होता है । लिनोलिक अम्ल इन असंतृप्त वसीय अमलों में प्रमुख होता है, जोकि ७८ प्रतिशत होता है । लियोलिक अम्ल रक्त में कोलेस्ट्राल का मात्रा को नियंत्रित करता है । अतः इसका सेवन हृदय रोगियों के लिये उपयुक्त रहता है । कुसुम के हरे पत्ते की स्वादिष्ट सब्जि बनती है, जिसमें लौह तत्व तथा कैरोटिन की प्रचुर मात्रा होने के कारण अत्यन्त स्वास्थ्यप्रद होता है । कुसुम की सूखी लाल पंखुड़ियों से अनेक प्रकार का “खाने योग्य रंग” प्राप्त होता है । पंखुड़ियों से चाय के समान पेय पदार्थ बनाया जाता है, जिसे कुसुम चाय कहा जाता है । यह चाय स्वाद एवं गन्ध में उत्तम होती है । यह चाय जोड़ों के दर्द, रक्त स्त्राव, हृदय धमनियों के रोगो तथा चोटग्रस्त ऊतकों के उपचार में लाभदायक होता है । इन पंखुड़ियों को भेजन में स्वाद एवं रंग के लिये मसालों के रुप मे उपयोग में लाया जाता है ।

तालिका १ कुसुम का प्रयोग

 

उत्तर भारत में कुसुम की खेती- कुसुम की अधिकांश खेती दक्षिण और मध्य भारत में की जाती है (तालिका २) । अधिकांश प्रजातियों और तकनीक का विकास उसी क्षेत्र के लिये किया गया है । वर्षो पहले उत्तरी भारत में भी कुसुम की खेती खेत के चारों तरफ बाढ़ के रुप मे की जाती थी । इसका उद्देश्य मुख्य फसल को पशुओं के चरने से बचाने के लिये किया जाता था । कालान्तर में यह प्रणाली धीरे-धीरे विलुप्त हो गई और इसकी खेती उत्तरी भारत में समाप्त हो गई । वर्तमान कुसुम का क्षेत्रफल बढ़ाने पर जोर दे रही है ( तालिका ३) । यह तभी संभव होगा जब इसकी खेती उत्तरी भारत के गैर पारम्परिक क्षेत्रों में बढ़ायी जाये । उत्तर भारत के राज्य पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, और पश्चिमी बंगाल कुसुम की खेती का क्षेत्रफल बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते है । तत्काल की समस्या है कि इन प्रदेशों में सीमित अनुसंधान प्रजातियों और खेती की विधियों पर हुये है । इस कारण उपयुक्त प्रजातिया जिनकी खेती उत्तरी भारत में हो सके उपलब्ध नही है । बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से विकसित एक मात्र प्रजाति एच यु एस ३०५ जिसका दुसरा नाम मालवीय कुसुम ३०५(305) है, वर्ष १९८६ (1986) में विकसित करके जारी की गई थी । उसके बाद से उत्तर भारत के किसी भी संस्थान में कोई भी प्रजाति विकसित नहीं की है । मालवीय कुसुम ३०५ भी एक कांटेदार प्रजाति है जोकि तैयार होने में लगभग पाच महीने का समय लेते है । इस कारण कई भी किसान इसकी खेती नही करना चाहता ।

तालिका २ भारत में कुसुम का क्षेत्र, उत्पादन एवं उत्पादकता (2015-2016)

श्रोत- कुसुम पर वार्षिक समूह बैठक, भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान,निदेशक की रिपोर्ट, 2017

तालिका ३ सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य वर्ष 2012 से 2018 तक (प्रति कुन्तल)

कुसुम उत्पादन के लिये भूमि का चुनाव- कुसुम फसल से अच्छे उत्पादन के लिये मध्यम काली भूमि से लेकर भारी काली भूमि उपयुक्त मानी जाती है । इसके लिये सर्वोत्तम भूमि हल्की मिट्टी वाली तथा अच्छे जल निकास वाली होती है । इसको क्षारीय भूमि में भी उगाया जा सकता है ।
फसल चक्र- इस फसल को सुखा वाले क्षेत्र या बारानी खेती में खरीफ मौसम में किन्ही कारणों से फसलों के खराब होने के बाद आकस्मिक दशा में या खाली खेतीं में नमी का संचय कर सरलता से उगाया जा सकता है ।
खरीफ की दलहनी फसलों के बाद द्वितीय फसल के रुप मे जैसे- सोयाबीन, मूंग, उड़द या मूंगफली के बाद रबी की द्वितीयक फसल के रुप मे कुसुम को उगाया जा सकता है । खरीफ में मक्का या ज्वार फसल ली हो तो रबी में कुसुम फसल उगाया जा सकता है ।
बीजोपचार- कुसुम फसल को बौने से पूर्व बीजोपचार करना आवश्यक है, जिससे कि फफूंद से लगनी वाली बीमारिया न हो । बीजो का उपचार करने हेतु तीन ग्राम थायरम या ब्रासीकाल फफूंदनाशक दवा का प्रयोग प्रति किलोग्राम की दर से करना चाहिए । तीन ग्राम ट्राईकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर भी बीजोपचार किया जा सकता है ।
प्रजाति – जी भी प्रजातिया या संकर विकसित है वे मध्य और दक्षिण भारत के लिये उपयुक्त है । यदि उनको उत्तरी भारत में लगाया जाता है तो उनकी अवधि में 30 से अधिक दिन की बढ़ोतरी हो जाती है इस कारण अधिक उपजशील प्रजातिया जो मध्य और दक्षिण भारत में 140 दिन में तैयार हीता है उनकी अवधि 170 दिन हो जाती है । इसलिए मध्य प्रदेश में विकसित कम अवधि की प्रजातिया ही उत्तरी भारत के लिये उपयुक्त होता है । इस तरह से इन्दौर में विकसित जे ऐस आई 99 नामक प्रजाति ही उत्तरी भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश के लिये सर्वोत्तम है, इसमें कांटे बहुत ही कम होते हैं तथा यह 120 दिन में पक कर कटाई योग्य ही जाती है । मालवीय कुसुम 305 लगभग 150 दिन में तैयार हीता है तथा इनकी पत्तिया अत्यन्त कांटेदार होते है । इससे किसान को कटाई और मढाई में कठिनाईयाँ होती है ।
बोने का समय- मूंग या उड़द यदि खरीफ मौसम में बोयी गयी हो तो कुसुम फसल बोने का उचित समय सितम्बर माह के अन्तिम दिन से अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह तक का होता है । यदि खरीफ फसल के रुप में सोयाबीन बोयी है तो कुसुम फसल बोने का उचित समय नवम्बर के मध्य तक भी है । यदि खरीफ मौसम में कोई फसल नहीं बोयी गई है तो कुसुम लगाने का उचित समय सितम्बर माहके अन्तिम सप्ताह से लेकर मध्य नवम्बर माह के प्रथम सप्ताह तक होता है । चूंकि उत्तरी भारत में लगभग सभी खेती में खरीफ के मौसम में कोई ना कोई फसल लगी होती है तो उसकी कटाई के बाद ही कुसुम लगाया जा सकता है । नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में भी…
कोट- कुसुम फसल में सबसे ज्यादा माहीं की समस्या रहती है। यह पत्तियों तथा मुलायम तना का रस चूसकर नुकसान पहुंचाता है । इसके निवारण के लिए मिथाइल डेमेटाल 25 ई.सी का 0,05 प्रतिशत या डाईमिथियोट 30 ई.सी का 0,03 प्रतिशत या ट्राइजोफास 40 ई.सी. का 0,04 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करे । आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन बाद पुनः छिड़काव करे ।
कुसुम की फल छेदक इल्ली: इसका प्रकोप पौधे में फूल आने की आरम्भिक स्थिति में देखा जाता है । इसको इल्लियाॅ कलियाँ के अन्दर रहकर फूल के प्रमुख भागों को नष्ट कर देती है । इसको रोकथाम के लिए इडोसल्फान 35 ई.सी, का 0.07 प्रतिशत या क्लोरोपायरीफाह 20 ई.सी. का 0.04 प्रतिशत या डेल्टामेथीन का 0.01 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करे ।
जड़ सड़न रोग:- जब कुसुम के पौधे छोटे होते है तब सड़न बीमारी देखने को मिलता है । पौधे की जड़े सड़ जाने से जड़ाॅ पर सफेद रंग का फफूंद जम जाता है । पौधे की जड़े सूख जाने के कारण पौधा सूख जाता है तथा रोकथाम के लिए बीजो को बीजोपचार करके ही बोना चाहिए ।
भभूतिया रोग:- इस बीमारी से पत्ते व तनों पर सफेद रंग का पाउडर जैसा पदार्थ जमा हो जाता है । खेती में इस प्रकार के पौधे दिखने पर घुलनशील गंधक 3 ग्राम प्रति लीटर लेकर छिड़काव करे ।
गेरुआ रोग:- इस बीमारी का प्रकोप होने पर डायथेन एम 45 नामक दवा, एक लीटर पानी में 3 ग्राम मिलाकर फसल पर रोकथाम कर सकते हैं ।
फसल कटाई:- काटेवाली जाति में कांटों के कारण फसल काटने में थोड़ी कठिनाई जरूर होती हैं । काॅटेवाली फसलों में पत्तों पर कांटे होते है । बायें हाथ में दस्ताने पहन कर या हाथ में कपड़ा लपेटकर या दी शाखाऔ वाली लकड़ी में पौधे को फंसा कर दसते से आसानी से फसल को काटा जा सकता है । कांटे रहित जातियों की कटाई में कोई समस्या नहीं है । बहुत अधिक क्षेत्र में कुसुम की फसल लगी है तो कम्बाइन हावॅस्टर से भी कटाई कराये जा सकता है ।

महत्व- कुसुम की खेती व्यवसायिक रुप से फूल व बीज से प्राप्त तेल के लिए की जाती है, जिससे अनेक औषधीय गुण पाये जाते हैं । कुसुम के तेल से प्राप्त होने वाली शारीरिक स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी निम्न प्रकार है—

१. कुसुम के तेल में ओमेगा-6 नामक फेटी एसिड अत्याधिक मात्रा में पाया जाता है, जो हमारे शरीर के अत्यन्त ही फायदेमंद तथा आवश्यक तत्व माना जाता है । इस एसिड के पाये जाने की वजह से कुसुम के तेल को खाने से हमारे शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा नियंत्रित रुप से बनी रहती है । जिसके वजह से हृदय सम्बन्धीत समस्याए भी दूर होने लगती है । जिन लोगो को मधुमेह की बीमारी है वे ब्लड शुगर की मात्रा को भी नियंत्रित कर सकते हैं ।
२. जिन लोगो को अपना शारीरिक वज़न कम करना होता है उनके लिए कुसुम का तेल खाना एक उचित उपाय माना जाता है । कुसुम के तेल मे ओमेगा-6 नामक फंटी एसिड शरीर की (वसा) को जमा करने के बजाय अतिरिक्त (वसा) को नष्ट करता है , इसी वजह से यदि आप कुसुम का तेल नियमित रूप से भोजन को पकाने के लिए प्रयोग करते हैं तो आप बड़ी आसानी से अपना बजन कम करके मोटापा कम कर सकते है ।
३. कुसुम के तेल में ओलिक एसिड भी प्राप्त मात्रा में पाया जाता है, जिसकी वजह से बालों की त्वचा तथा बाल स्वास्थ्य रहते हैं । ओलिक एसिड की वजह से सिर की त्वचा में रक्त का सही रुप से परिसंचरण होता है । बालों की बृद्धि होती है प्रत्येक रोम में मजबूती प्रदान होता है । यह बालों को चमत्कार तथा जीवित बना देता है । इसलिए इसका अक्सर इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनीं को बनाने में किया जाता है ।
४. कुसुम के तेल में लिनाॅलिक एसिड की अत्याधिक मात्रा पायी जाती है, जो त्वचा के स्वास्थ्य सौन्दर्य के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । लिनाॅलिक एसिड से त्वचा की गुणवत्ता तथा दिखावट को बढावा मिलता है । यह चहरे पर से काले दाग़ धब्बे को कम करता है तथा नयी त्वचा की कोशिकाओं मे सुधार लाता है ।
५. कुसुम के कई फायदे होने के साथ ही साथ इसका अधिक प्रयोग करने से स्वास्थ्य पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता ।
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